सुबह के चार बज रहे है| नहीं , मुझे इतनी सुबह उठने की आदत नहीं है| पर कुछ दिनों से रात भर जागा ही रहता हू। आज भी कुछ ऐसा ही है। मुझे अभी भी चिंता सता रही है कि हम दोनों का रिश्ता कहाँ जाएगा, ये जानते हुए भी की ईशा के तरफ से ये सब बहुत पहले ही ख़त्म हो चुका है। फ़ोन पर बात करते समय हमेशा की तरह आज भी मुझे यही लग रहा था जैसे वो मुझे टेस्ट कर रही हो।जैसे ही मैं बोला - 'चल यार सब ख़त्म, तू अपने रस्ते मै अपने। ' वो बोलेगी 'ओह्ह, इतने में ही हार मान गया। बहुत बड़ी बड़ी बाते किया करता था न? क्या हुआ हीरो!' पर, इस बार लग रहा है सबकुछ ख़त्म। उसको मुझसे बात करने में कोई परेशानी नहीं है। हम दोस्त रह सकते है, पर मेरा मन मानने को तैयार नहीं है इस बात के लिए, जब प्यार का रिश्ता ख़त्म ही करना है तो ये दोस्ती वगैरह का चुतियाप करके काहे महान बन रही है। प्यार है तो है, नहीं तो नहीं। 'ठीक है, फिर सब ख़त्म' 'नहीं यार ऐसे कैसे सब ख़त्म, इतने दिनों से साथ थे' 'वी क्नोव इ...
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